Wednesday, August 14, 2013

आज़ादी के 66 साल: नेहरु की वो गलतियां जिन्हें 50 साल बाद भी भुगत रहा है भारत

१९४७ के युद्ध में जब भारत की सेनाये जितने लगी थी अगर २ दिन ओर युद्ध चलता तो पूरा कश्मीर हमारा होता  युद्ध में पकिस्तान की हर होती देख कर जिन्ना ने भारत के नेताओं को पाकिस्तान आकर बातचीत करने का न्योता दिया। इस पर चर्चा के लिए
भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंट बेटेन, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल इकट्ठा हुए। बैठक में जिन्ना के न्योते पर पटेल ने आपत्ति जताई और पाकिस्तान न जाने की सलाह दी। लेकिन नेहरू और माउंट बेटेन जिन्ना के न्योते को लेकर नरम थे। बैठक में तय हुआ कि जिन्ना से बातचीत के लिए पाकिस्तान का दौरा होगा। लेकिन दौरे से ऐन पहले नेहरू की तबियत खराब हो गई। दौरे पर सिर्फ माउंट बेटेन गए। माउंट बेटेन पाकिस्तान गए और जिन्ना से बातचीत की।
तभी अचानक नेहरू ने 2 नवंबर को आकाशवाणी पर राष्ट्र के नाम संदेश में एकतरफा एलान कर दिया कि वे इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाएंगे और भारत या पाकिस्तान में शामिल होने या आज़ाद रहने पर फैसले के लिए कश्मीर के लोगों के बीच जनमत संग्रह कराया जाएगा। नेहरू के उस एलान की कीमत आज भी भारत चुका रहा है। तब से लेकर आज तक यह मुद्दा विवादों से घिरा रहा है और कश्मीर के लोगों के बीच जनमत संग्रह की मांग उठती रही है।

हिंदू कोड बिल 
जवाहर लाल नेहरू ने पहला लोकसभा चुनाव जीतने के बाद हिंदू कोड बिल यह कहते हुए लागू किया कि इससे हिंदू समाज में सुधार आएगा। लेकिन उन्होंने यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करने में असमर्थता जताई थी। हिंदू समाज को यह आपत्ति थी कि अगर सामाजिक सुधार की जरुरत है तो सिर्फ हिंदू समाज ही क्यों देश के सभी धर्मों के लोगों को इसके दायरे में लाया जाना चाहिए। लेकिन नेहरू ने कहा था कि पहले हिंदू समाज से इसकी शुरुआत होनी चाहिए और फिर अन्य धर्मों पर भी इसे लागू किया जाएगा। लेकिन आज तक भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू नहीं किया गया। ऐसी किसी भी कोशिश पर अन्य धर्म के लोग आपत्ति जताते हैं।

तिब्बत पर चीन के हक को दी मंजूरी 
नेहरू चीन से दोस्ती के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक थे। वे चीन को खुश करने के लिए कई तरह के उपाय कर रहे थे। नेहरू ने 1953 में अमेरिका की उस पेशकश को ठुकरा दिया था, जिसमें भारत से सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के तौर पर शामिल होने को कहा गया था। इसकी जगह नेहरू ने चीन को सुरक्षा परिषद में शामिल करने की सलाह दे डाली थी। अगर नेहरू ने उस पेशकश को स्वीकार कर लिया होता तो कई दशकों पहले भारत सामरिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद मजबूत देश के तौर पर उभर चुका होता। 

जवाहर लाल नेहरू की चीन को लेकर दरियादिली का सिलसिला यहीं नहीं थमा। नेहरू ने 29 अप्रैल, 1954 को चीन के साथ पंचशील के सिद्धांत पर समझौता किया था। इस समझौते के साथ ही भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया था। नेहरू ने चीन से दोस्ती की खातिर तिब्बत को भरोसे में लिए बिना उस पर चीन के 'कब्जे' को मंजूरी दे दी। जानकार मानते हैं कि भारत के इस समझौते के बाद से ही हिमालय में भू-राजनैतिक हालात हमेशा के लिए बदल गए। चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने तिब्बत में अपने विस्तार का जो सिलसिला शुरू किया, वह आज भी जारी है। दुनिया की छत कहे जाने वाले तिब्बत में चीन के खिलाफ आंदोलन आज भी चल रहा है। तिब्बत में चीन के पांव पसारने का नतीजा यह हुआ है कि आज उसके हौसले बुलंद हैं और वह न सिर्फ गाहे ब गाहे वास्तविक नियंत्रण रेखा का उल्लंघन कर रहा है बल्कि अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा बताता है। नेहरू की वह गलती भाज भारत पर बहुत भारी पड़ रही है।

चीन ने भोंका पीठ में छुरा 
नेहरू शांति और समझौते के दम पर चीन के साथ सीमा विवादों को सुलझाना चाहते थे। उनकी मंशा पर किसी को शक नहीं था। लेकिन नेहरू चीन की शातिराना चालों को पढ़ने में नाकाम रहे। चीन के साथ विवादों को सुलझाने के लिए उन्होंने 'पंचशील' समझौते के तहत तिब्बत पर चीन के हक को मंजूरी भी दी थी। लेकिन नेहरू का चीन पर भरोसा भारत पर बहुत भारी पड़ा। 1962 में चीन ने भारत पर हमला बोल दिया। आज़ादी के बाद भारत आज तक सिर्फ एक लड़ाई हारा है। यह वही जंग थी, जिसमें भारत को नीचा देखना पड़ा। नेहरू का हिंदी चीनी भाई-भाई का नारा किसी काम न आया और चीन के साथ जंग में बड़ी संख्या में भारत ने अपने वीर सपूत खोए।

राज्यों का बंटवारा 
नेहरू ने भाषा के आधार पर मद्रास स्टेट को तोड़कर आंध्र प्रदेश और बॉम्बे स्टेट को तोड़कर महाराष्ट्र और गुजरात का निर्माण किया था। भाषायी आधार पर राज्यों का गठन एक बार शुरू हुआ तो यह सिलसिला आगे भी जारी रहा। आज हालत यह है कि देश में दर्जन भर राज्यों में अलग सूबे के निर्माण की आग भड़की हुई है।






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आज़ादी के 66 साल: नेहरु की वो गलतियां जिन्हें 50 साल बाद भी भुगत रहा है भारत

१९४७ के युद्ध में जब भारत की सेनाये जितने लगी थी अगर २ दिन ओर युद्ध चलता तो पूरा कश्मीर हमारा होता  युद्ध में पकिस्तान की हर होती देख कर जिन्ना ने भारत के नेताओं को पाकिस्तान आकर बातचीत करने का न्योता दिया। इस पर चर्चा के लिए

प्लासी का युध्द और भारत की हार

प्लासी का युद्ध 23 जून 1757 को
मुर्शिदाबाद के दक्षिण में २२ मील
दूर नदिया जिले में गंगा नदी के

Tuesday, July 2, 2013

मिटती आस्था, टूटता देश

मिटती आस्था, टूटता देश

Monday, June 17, 2013

कब होगा कल्कि अवतार



जब-जब धर्म की हानि होती है, भगवान अवतार लेकर अधर्म का अंत करते हैं।
हिन्दू धर्मग्रंथों में इस संदेश के साथ अलग-अलग युगों में जगत का दु:ख और भय दूर करने वाले ईश्वर के अनेक अवतारों के पौराणिक प्रसंग हैं। दरअसल, इनमें सच्चाई और अच्छे कामों को अपनाने के भी कई सबक हैं। साथ ही इनके जरिए युग के बदलाव के साथ कर्म, विचार व व्यवहार में अधर्म और पाप के बढ़ने के भी संकेत दिए गए हैं।

इसी कड़ी में सतयुग, त्रेता, द्वापर के बाद कलियुग के लिए बताया गया है कि इसमें अधर्म का ज्यादा बोलबाला होगा, जिसके नाश के लिए भगवान विष्णु का कल्कि रूप में दसवां अवतार होगा। रामचरितमानस में भी कलियुग में फैलने वाले अधर्म का वर्णन मिलता है।

आज के दौर में भी व्यावहारिक जीवन में आचरण, विचार और वचनों में दिखाई दे रहे सत्य, संवेदना, दया या परोपकार जैसे भावों के अभाव से आहत मन अनेक अवसरों पर कलियुग के अंत और कल्कि अवतार से जुड़ी जिज्ञासा को और बढ़ाता है। 


हिन्दू धर्मग्रंथ भविष्य पुराण में अलग-अलग युगों की गणना व अवधि बताई गई है। इस आधार पर तस्वीरों पर क्लिक कर जानिए कि कलियुग की अवधि कितनी बाकी है और खुद अंदाजा लगा लें कल्कि रूप में भगवान विष्णु कब अवतरित होंगे?

भविष्य पुराण के मुताबिक मानव का एक वर्ष देवताओं के एक अहोरात्र यानी दिन-रात के बराबर है। इसमें उत्तरायण दिन व दक्षिणायन रात मानी जाती है। दरअसल, एक सूर्य संक्रान्ति से दूसरी सूर्य संक्रान्ति की अवधि सौर मास कहलाती है। मानव गणना के ऐसे 12 सौर मासों का 1 सौर वर्ष ही देवताओं का एक अहोरात्र होता है। ऐसे ही 30 अहोरात्र, देवताओं के एक माह और 12 मास एक दिव्य वर्ष कहलाता है। देवताओं के इन दिव्य वर्षो के आधार पर चार युगों की मानव सौर वर्षों में अवधि दी गई है |

सतयुग- 4800 (दिव्य वर्ष) 17,28,000 (सौर वर्ष)। त्रेतायुग- 3600 (दिव्य वर्ष) 12,96,100 (सौर वर्ष)। द्वापरयुग- 2400 (दिव्य वर्ष) 8,64,000 (सौर वर्ष)। कलियुग- 1200 (दिव्य वर्ष) 4,32,000 (सौर वर्ष)। इस तरह सभी दिव्य वर्ष मिलाकर 12000 दिव्य वर्ष देवताओं का एक युग या महायुग कहलाता है, जो चार युगों के सौर वर्षों के योग 43,200,000 वर्षों के बराबर होता है। खासतौर पर, कलियुग की बात करें तो पौराणिक व ऐतिहासिक तथ्यों पर गौर करने पर पता चलता है कि 4,32,000 साल लंबे कलियुग को शुरू हुए तकरीबन 6000 वर्ष ही गुजरे हैं। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि अभी कलियुग और कितना बाकी है व कलियुग में बढ़े पापों का संहार करने भगवान विष्णु का कल्कि अवतार होने में कितना वक्त लगेगा। इनके अलावा निकट भविष्य में प्रलय होने की बातों के दावे भी इस गणना से परखें जा सकते हैं।
 
नोट :-इस पोस्ट की समस्त जानकारी दैनिक भास्कर की वेबसाईट से ली गयी है |मुझे इस गणना की जानकारी नहीं है |अगर किसी के पास इससे सम्बंधित कोई जानकारी हो तो कृपया हमारे साथ शेयर करे |

Sunday, June 16, 2013

गाय के गोबर से उडेगा प्लेन

ये दावा देश के किसी हिंदूवादी संगठन का नहीं, बल्कि ऑस्ट्रेलियाई युवा वैज्ञानिकों के एक दल का है.
भविष्य में एयरक्राफ्ट कैसे होंगे और उनमें
किस तरह का ईंधन इस्तेमाल होगा, इसके बारे में इन दिनों यूरोप में एक मुकाबला चल रहा है. इसमें दुनियाभर के युवा वैज्ञानिकों को अपने
आइडिया या मॉडल पेश करने थे. यूरोप की प्लेन बनाने वाली कंपनी एयरबस ने इस मुकाबले का आयोजन किया था. इसमें आखिरी में जो पांच
आइडिया शॉर्टलिस्ट किए गए, उसमें से एक गोबर से प्लेन उड़ाने वाला भी था.
टीम क्लीमा नाम के वैज्ञानिक दल का दावा है कि गाय के गोबर और फार्म में पैदा होने वाले दूसरे कचरे से बनने वाली मीथेन गैस को प्लेन में
बतौर ईंधन इस्तेमाल किया जा सकता है. मॉडल के मुताबिक, इस गैस को खूब ठंडा करके एक खास किस्म के सांचे में भर दिया जाएगा. इसे प्लेन के
इंजन के साथ फिट किया जाएगा. यहां से इंजन की जरूरत के मुताबिक ईंधन की सप्लाई होती रहेगी.
मगर अभी इस मॉडल में एक दिक्कत भी है. दरअसल, प्लेन उड़ाने के लिए जितने ईंधन की जरूरत है, उसके हिसाब से गोबर की कमी पड़ जाएगी. इस
वैकल्पिक ईंधन पर काम करने वाले बताते हैं कि एक गाय सालभर में जितना गोबर देती है, उससे 70 गैलन ईंधन तैयार किया जा सकता है.
लंदन से न्यूयॉर्क जाने वाली फ्लाइट का उदाहरण लें तो साढ़े तीन हजार मील की दूरी तय करने वाली इस फ्लाइट के लिए हवाई जहाज
को 17,500 गैलन ईंधन चाहिए. इस तरह मौजूदा दर से देखें, तो 1 हजार गाय तीन महीने में जितना गोबर करेंगी, उससे पैदा हुई गैस इस एक
फ्लाइट में बतौर ईंधन खर्च हो जाएगी. इसलिए फिलहाल साइंटिस्ट इस तरह के प्रयोग कर रहे हैं, जिसमें कम से कम गोबर से ज्यादा से
ज्यादा गैस यानी ईंधन प्रॉड्यूस किया जा सके.
यदि ये प्रयोग सफल रहा, तो पर्यावरण के लिए भी बेहतर होगा. क्लीमा टीम का आकलन है कि गोबर से बनने वाला ईंधन कार्बन-
डाईऑक्साइड का बनना 97 फीसदी तक कम कर सकता है.
मीथेन का प्लेन उड़ाने के लिए बतौर ईंधन पहली मर्तबा इस्तेमाल होगा, लेकिन अमेरिका में खेती में काम आने वाले कई वाहन इसी तरह के ईंधन
से चलते हैं. इसका प्रोसेस बहुत सरल होता है. गाय-भैंस के गोबर और फार्म पर पैदा होने वाले दूसरे कचरे को एक टैंक में स्टोर किया जाता है.
सूरज की रौशनी पड़ने के बाद इस टैंक में मीथेन गैस पैदा होती है, जिसका इस्तेमाल ईंधन के तौर पर किया जाता है.
सोर्स आजतक


Sunday, February 10, 2013

भारत का शिक्षा तंत्र और मैकाले

२ फरवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में दिया लार्ड मैकाले का भाषण)
-"मैंने भारत की ओर-छोर की यात्राकी है पर मैंने एक भी आदमी ऐसा नहीं देखा जो भीख मांगता हो या चोर हो। मैंने इस मुल्क में अपार संपदा देखी है। उच्च उदात्त मूल्यों को देखा है। इन योग्यता मूल्यों वाले भारतीयोंको कोई कभी जीत नहीं सकता यह मैंमानता हूं
, तब तक; जब तक कि हम इस मुल्क की रीढ़ ही ना तोड़ दें, और भारत की रीढ़ है उसकी आध्यात्मिकऔर सांस्क्रतिक विरासत।इसलिए मैं यह प्रस्ताव करता हूंकि भारत की पुरानी शिक्षा व्यवस्था को हम बदल दें। उसकी संस्क्रति को बदलें ताकि हर भारतीय यह सोचे कि जो भी विदेशी है, वह बेहतर है। वे यह सोचने लगें कि अंग्रेजी भाषा महान है अन्य देशी भाषाओं से। इससे वे अपना सम्मान खो बैठेंगे। अपनी देशज जातीय परंपराओं को भूलने लगेंगे और फिर वे वैसे ही हो जाएंगे जैसा हम चाहते हैं, सचमुच एक आक्रांत एवं पराजित राष्ट्र।
जब तक किसी बच्चे को धर्म और संस्कृति की शिक्षा नहीं दी जाती तब तक क्या वो कभी इंसान बन सकता है? नहीं
हमारा शिक्षा तंत्र हमें यह सब नहीं सिखाता। होना चाहिये था अंग्रेजों के जाने के बाद हमारी जो प्राचीन परम्पराये और रीति रिवाज है उनमें छिपे विज्ञान पर अनुसंधान होने चाहिये थे ताकि उस ज्ञान का राष्ट्र हित में उपयोग किया जा सके हुआ क्या अंनुसंधान तो बहुत दूर की बात है उन परम्पराओं को अंधविश्वाश घोषित कर दिया गया।हमारा जो प्राचीन आयुर्वेद,ज्योतिष ज्ञान , नाडी ज्ञान , दादी-नानी के घरले उपचार ,....... ये सब कुछ लगभग लगभग नष्ट हो चुके है।हम तो इन्हे नष्ट कर रहे है और दूसरे देशों ने हमारे ज्ञान की बदौलत नई नई खोज करके अपने नाम से पैटेन्ट करा ली। हमारी सोच को 33% तक सीमित कर दिया जाता है 33% में भी ग्रेस ,सप्लीमेन्टरी, बैक पेपर .... आदि का सिस्टम होता है।
हमारा शिक्षा तंत्र एसा होना चाहिये जो किसी व्यक्ति को अपने आप में सक्षम बनाये उनमें एक राष्ट्र हित की भावना का संचार करे।लेकिन हमारा शिक्षा तंत्र ये कुछ नहीं सिखाता ।तम्बाकू और सिगरेट के पैकेट पर एक वार्निग लिखी रहती है। लाखो लोगो को हम तम्बाकू से होने वाले कैंसर से मरते देखते है। फिर भी बडे बड विद्वान लोग जिनमें इंजीनीयर,मैनेजर, स्नातन, कर्मचारी वर्ग.......इत्यादी तम्बाकू के पाउच के उपर लिखी चेतावनी तक नहीं पड सकते यह है हमारे शिक्षा तंत्र की हकीकत
अगर हमारे देश में एक छोटा सा काम हो जाये विद्यालयों में योग और घरेलु आयुर्वेद जिसमें तुलसी, नीम ,हल्दी, लौंग ... आदि का उपचार के रूप में उपयोग करने की कक्षायें आरम्भ की जायें तो लगभग 50%  से ज्यादा दवाईयों और अस्पतालों का खर्चा कम हो जायेगा।
हमारे स्कूलों में पासिंग मार्क्स 33% है जब आप उच्चा कक्षा में अध्यन करने जाओगे तो वो मांगेगे 60% मार्क्स।अब क्या करें हमको तो अपने बच्चे का एडमिशन कराना है फिर हम कोलेज एडमिनिस्ट्रेशन से विनती करेंगे।तब काँलेज वाले बोलेंगें आपको 5 लाख का डोनेशन देना पडेगा। कोई बोलेगा आपको 3 लाख डोनेशन देना पडेगा। आज कल यह डोनेशन का धन्धा प्राइमरी कक्षाऒं में भी होने लगा है। आप दिल्ली मुम्बई में जाकर देखिये स्कूल फीस अलग , गाडी की अलग, ट्यूशन की अलग और ना जाने क्या क्या फीस देनी पडती है।
भारत के शिक्षा तंत्र में एक बहुत बडी बीमारी है जिसका नाम है ट्यूशन । जो लोग ट्यूशन पडाते है उनकी कोशिश रहती है ज्यादा से ज्यादा स्टूडेन्ट उनके पास आये ट्यूशन पडने के लिये।उसके लिये वो विद्यार्थियों के मन में एक भावना बैठाते है कि उनको ट्यूशन पडना ही है बिना ट्यूशन के वो सीख ही नहीं सकते। कुछ अध्यापक क्या करते है जिन स्कूलों में वो पडाते है उसमें वो क्लास में एक फोर्मल्टी करते है पडाने कि वो स्टूडेन्ट्स को सिर्फ ट्यूशन में पडाते है।इस कन्डीशन में हमारी मजबूरी बन जाती है कि हम ट्यूशन पडे । एक तो हम शिक्षा का बोझ दूसरा यह ट्यूशन फीस का बोझ इन बोझों के तले हम दब जाते है। कभी कभी क्या होता है हमारे पास अच्छे अध्यापक नहीं होते उस स्थिति में हमें ट्यूशन करना पडता है। अच्छे अध्यापक क्यों नहीं क्योंकि उनमें योग्यता नहीं है उनमें योग्यता क्यों नहीं क्योंकि वो योग्यता से नौकरी नहीं लगे आरक्षण के बल पर नौकरी लगे।हमको क्या करना चाहिये जो आरक्षण नौकरियों में दिया गया है उसको हटा देना चाहिये। उसके स्थान पर शिक्षा में सुविधाऔं पर आरक्षाण देना चाहिये वो भी गरीबी के आधार पर जैसे गरीबों को निशुल्क किताबें देना, फीस माँफ करना, यूनीफार्म बनवाना ....... जो भी आरक्षन है यहीं तक होना चाहिये नौकरियों में नहीं।
ये जो कुचक्र बना हुआ है स्कूल ट्यूशन फिर एक और ट्यूशन इसमें एक छोटा बच्चा फस जाता है और जो सैल्फ स्टडी के जो समय उसे मिलना चाहिये था वो नहीं मिल माता।
इसके अलावा ऒर बहुत सी कमियाँ है। हमारे शिक्षा तंत्र में  आजकल एक और नई बात देखने को मिल रही है बच्चों को पहली कक्षा से इंगलिश मीडियम स्कूलों में भेजने लग गये है। बच्चे को कुछ समझ नहिं आता टीचर क्या बोल रही है वो उधर चुपचाप बैठ कर इधर उधर देखकर अपना समय निकाल रहा है और घर पर माँ बाप खुश हो रहे है कि हमारा बेटा इंग्लिश मीडियम में पढ रहा है।
जैसा की विवेकानन्द जी कहते थे हमें ऎसा शिक्षा व्यवस्था चाहिये जो वयक्ति निर्माण के साथ साथ राष्ट्र निर्माण में सहायक हो। जापान एक छोटा सा देश है जो कि 1945 में परमाणु हमले के बाद लगभग लगभग नष्ट हो गया था । उसकी भौगोलिक परिस्थितियाँ भी भारत से बहुत खराब है। फिर भी वो आज तकनीकी के क्षेत्र में हमसे बहुत आगे निकल गया।
एक सपना मैकाले ने देखा था और एक सपना राजीव दीक्षित जी ने देखा था
जिस दिन लार्ड मैकाले का सपना पूरा और राजीव भाई का सपना ध्वस्त हो जाएगा, उस दिन देश पूरे तौर पर केवल 'इंडिया' रह जाएगा। हो सकता है, समय ज़्यादा लग जाए, लेकिन अगर भारतवर्ष को एक स्वाधीन राष्ट्र बनना है, तो इन दो सपनों के बीच कभी न कभी टक्कर होना निश्चित है।

Thursday, February 7, 2013

स्वदेशी वस्तुओं की सूची

सन 1947 में 1 रुपया 1 डालर के बराबर होता था जो वर्तमान में घटकर 55रुपये 1 डालर के बराबर हो गया है। भारत पर वित्त वर्ष 2011-12 के अंत में विदेशी ऋण मार्च 2011 के 305.9 अरब डॉलर की तुलना में 13 प्रतिशत अर्थात 39.9 अरब डॉलर बढकर 345.8 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। आजादी के 60 वर्ष बाद भी हमें खिलौने भी चीन के बने हुये प्रयोग करते है।
थोक के भाव इंजीनीयर पैदा करने वाले देश में.कैलकुलेटर, मैमोरी कार्ड , सिम कार्ड ...... जैसी छोटी छोटी वस्तऐं भी चीन से आयातित करनी पड रही है।
दैनिक रोजमर्रा की वस्तुओं साबुन, सैम्पू, क्रीम, तेल, जूता, कपडे, पैन, घडी, मोबाईल, पानी की बोतल, चाय, काँफी,अचार का डिब्बा,......यहाँ तक नमक भी इनमें अधिकाँश वस्तुऐं विदेशी होती है।
अभी भी वक्त है अगर अभी भी हमने ध्यान नहीं दिया तो भारत में आर्थिक गुलामी आ जायेगी। भारत की अर्थव्यवस्था विदेशी कम्पनियों की गुलाम बन जायेगी। कहीं ऎसा ना हो आने वाले समय में हमारी पीढी हमसे कहे जब विदेशी कम्पनियाँ देश लूट रही थी तब तुम क्या फेसबुक चला रहे थे।
आने वाली आर्थिक गुलामी से बचने का एक मात्र उपाय है स्वदेशी प्रचार।अपने जीवन में जितना सम्भव हो सके स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग कीजिये तभी राजीव भाई के सपनों के भारत का निर्माण हो सकता है।
स्वदेशी वस्तुओं की सूची
(1)  उत्पाद-टूथपेस्ट/दंतमंजन   
विदेशी-कोलगेट, हिन्दुस्तान लीवर (क्लोजअप, पेप्सोडेंट, ऐम, सिबाका), एक्वाफ्रेश, एम वे (फोरहन्स), ओरबली, क्वान्टम आदि।
स्वदेशी-कामधेनु काला दंतमंजन, दंतक्रान्ति, दंत मंजन (पतंजलि), मंजन एम.डी.एच.,विको बज्रदन्ती, वैद्यनाथ, गुरुकुल फार्मेसी, चॉइस, नीम, एंकर, मिस्वाक, बबूल, प्रोमिस आदि।
(2) उत्पाद- टूथब्रश
विदेशी- कोलगेट, क्लोजअप, पेप्सोडेन्ट, एक्वाफे्रश, सिबाका आदि।
स्वदेशी- प्रोमिस, अजय, अजन्ता, मोनेट, रोयल, क्लासिक, डॉ. स्ट्रॉक आदि।
(3) उत्पाद- नहाने का साबुन
विदेशी- हिन्दुस्तान लीवर, (लक्स,लिरिल, लाईफबॉय, लेसांस, डेनिम, केमे, डॉव, रेवलॉन, पियर्स, रेक्सोना, ब्रीज, हमाम, ओके) पॉण्डस, डिटोल, क्लियरसिल, पामोलिव, एमवे, जॉनसन बेबी आदि।
स्वदेशी- प्राकृतिक स्नान बटी, कायाकान्ति, कायाकान्ति एलोविरा(पतंजलि), निरमा, मेडीमिक्स, नीम, निमा, जेस्मीन, मैसूर, सेंदल, कुटीर, सहारा हिमानी, ग्लिसरीन, गोदरेज (सिंथोल, फेयरग्लो, शिकाकाई, गंगा) विप्रो, संतुन आदि।
(4) उत्पाद-शैम्पू
विदेशी- कोलगेट पामोलिव (हैलो पामोलिव), हिन्दुस्तान लीवर (लक्स, क्लिनिक, सनसिल्क, रेवलॉन, लेक्मे) प्रोक्टर एवं गेंबल (पेन्टीन, मेडीकेयर), पोण्डस, ओल्ड स्पाइस, शावर टू शावर, हेड एवं शोल्डर, जॉनसन बेबी आदि।
स्वदेशी- केशकांति (पतंजलि), विप्रो, पार्क अवेन्यु, स्वातिक अयुर हर्बल, केशनिखार, हेयर एण्ड,केयर, नाइसिल, अर्निका, वेलवेट, डाबर वाटिका, बजाज, नाईल, लेवेण्डर, गोदरेज आदि।
(5) उत्पाद- कपड़े व बर्तन धोने केसाबुन, वाउडर व नील
विदेशी- हिन्दुस्तान लीवर (सर्फ, रिन, सनलाइट, व्हील, ओके, विम) एरियल, चेक, हेन्को, रिविल, एमवे, क्वान्टम। ऊनी कपड़ों के लिए-वुलवाश, ईजी,। नील, रॉबिन ब्लू टीनापाल, स्काईलार्क आदि।
स्वदेशी- टाटा शुद्ध, निमा, मोदी, केयर, सहारा, स्वास्तिक, विमल, हिपोलीन, फेना, ससा, टीसीरिज, डॉ. डेट, घड़ी। ऊनी कपड़ों के लिए-जैटिल। नील-उजाला, रानीपाल, निरमा, चमको, डिप आदि।
(6) उत्पाद- शेविंग क्रीम
विदेशी- ओल्डस्पाइस, पामोलिव, पॉण्डस, जिलेट, इरास्मिक, डेनिम, यार्डले आदि।
स्वदेशी- पार्क अवेन्यु, प्रीमियम, वीजोन, इमामी, बलसारा, गोदरेज, निविया आदि।
(7) उत्पाद- शेविंग ब्लेड
विदेशी- जिलेट (7 ओक्लोक, इरास्मिक) विल्मैन, विल्टेज आदि।
स्वदेशी- टोपाज, गेलेन्ट, सुपरमेक्स, लेजर, एसक्वायर, सिल्वर प्रिन्स, प्रीमियम आदि।
(8) उत्पाद- क्रीम पाउडर व सौन्दर्य प्रसाधन की सामग्री
विदेशी- हिन्दुस्तान लीवर (फेयर एवं लवली, लेक्मे, लिरिल, डेनिम, रेवलोन), प्रोक्टर एवं गेम्बल, (आयल एवं ओले, क्लिरयसिल, क्लियरटोन), चार्मिस, पोण्डस, ओल्ड स्पाइस, डेटाल, नाइसिल, चार्ली, जॉनसन बेबी आदि।
स्वदेशी- कायाकांति ऐलोवेरा, कायाकांति, नीम, कांतिलेप (पतंजलि), बोरोसिल, अयुर इमामी, विको, बोरोप्लस, बोरोलीन, हिमानी,गोल्ड, नाईल, लेवेण्डर, हेयर एंड केयर, निविया, हेवन्स, सिंथोल, ग्लोरी, वेलवेट (बेबी) आदि।
(9) उत्पाद- रेडिमेड वस्त्र
विदेशी- रैंगलर, नाईक, ड्यूक, एडीडास, न्यूपोर्ट प्यूमा आदि।
स्वदेशी - केम्ब्रिज, पार्क अवेन्यु, ओक्जेम्बर्ग,बॉम्बे डॉइंग, रफ एंड टफ, ट्रिगर जिंस आदि।
(10) उत्पाद - घड़ी
विदेशी - राडो, रॉलैक्स, स्वीसको, सीको आदि।
स्वदेशी - टाइटन, एचएमटी, मैक्जिमा, पे्रस्टिज, अजन्ता।
(11) उत्पाद - पेन, पेन्सिल
विदेशी - पारकर, निकलसन, रोटोगेक, स्विसएयर,एडजेल, राइडर, मित्सुबिषी, फ्लेयर, यूनिबाल, पायलट,रोलगोल्ड आदि।
स्वदेशी - कैमल, किंग्सन, शार्प, सेलो, विल्सन,टुडे, नटराज, ऐम्बेसेडर, लिंक, मोन्टेक्स, स्टीक,संगीता, लक्सर, अप्सरा आदि।
(12) उत्पाद - कोल्ड ड्रिंक्स
विदेशी - कोका कोला (कोक, फैन्टा, स्प्राईट, थम्सअप,गोल्डपाट, लिम्का), पेप्सी (लहर, 7अप, मिरिंडा, स्लाइस) टीम, सिट्रा,क्रश, मेकडोवल।
स्वदेशी - गुलाब शर्बत, बादाम शर्बत (पतंजलि),दूध लस्सी, छाछ, जूस, नींबू पानी,नारियल पानी,शेक, ठंडाई, जलजीरा। रूहअफजा, रसना, फ्रूटी,गोदरेज, जंपईन आदि।
(13) उत्पाद - चाय व कॉफी
विदेशी - लिप्टन (टाईगर, ग्रीन लेबल, येलो लेबल,चीयर्स) ब्रुक बॉण्ड (रेड लेबल, ताजमहल), गोडफ्रेफिलिप्स, पोलसन, गुडरिक, सनराईज, कॉफी - नेस्ले,नेस्केपे, रिचबू।
स्वदेशी - चाय दिव्य पेय (पतंजलि),टाटा, ब्रह्मपुत्र,असम, गिरनार। कॉफी - इण्डियन कैफे, एम. आर.।
(14) उत्पाद - शिशु आहार व दूध पाउडर
विदेशी - नेस्ले (लेक्टोजन, सेरेलक, नेस्टम, एल.पी.एफ., मिल्क मेड, नेस्प्रे, एवरीडे, गाल्टको), ग्लेक्सो (फैरेक्स) आदि।
स्वदेशी - शहद, दालों का पानी, उबले चावल, फलों का रस।अमूल, इण्डाना, सागर, तपन, मिल्क, केयर आदि।
(15) उत्पाद - आइसक्रीम
विदेशी - वाल्स, क्वालिटी, डोलप्स, कैडबरी आदि।
स्वदेशी - घर की बनी आइसक्रीम, कुल्फी, अमुल, वाडीलाल, मिल्क फूडआदि।
(16) उत्पाद - नमक
विदेशी - अन्नपूर्णा, कैप्टन, कुक(हिन्दुस्तान लीवर), किसान (ब्रुकबाण्ड), पिल्सबरी आदि।
स्वदेशी - अंकुर नमक, सैंधा नमक (पतंजलि) लो सोडियम व आयरन-45, अंकुर, टाटा, सूर्या ताजा, तारा।
(17) उत्पाद - आलू चिप्स व नमकीन
विदेशी - अंकल, पेप्सी (रफल्स, हास्टेस), फनमंच आदि।
स्वदेशी - बीकानो नमकीन, हल्दीराम, घर में बनेचिप्स, बीकाजी एवं एवन आदि।
(18) उत्पाद - टमाटर सॉस, फ्रूट जैस
विदेशी - नेस्ले, ब्रुक बॉण्ड, (किसान), ब्राउन एंड पालसन आदि।
स्वदेशी - फ्रूट जैम, एपल जैस, मिक्स जैम, (पतंजलि) घर में बना सॉस। इण्डाना, प्रिया, रसना आदि।
(19) उत्पाद - बिस्कुट / चॉकलेट
विदेशी -कैडबरी (बोर्नविटा, 5 स्टार) लिप्टन, हार्लिक्स, न्यूट्रीन, इक्लेयर्स आदि।
स्वदेशी - गुड़ मुंगफली, बादाम ज्यादा स्वास्थ्यप्रद है। आंवला, कैन्डी, बेल कैन्डी, बिस्किट, कैंडी (पतंजलि)। ब्रिटानिया, पारले, बेकमेन्स, क्रीमिका, शाग्रिला, इन्डाना, अमूल, रावलगांव आदि।
(20) उत्पाद - पानी
विदेशी - एक्वाफिना, किनले, बैली, प्यारे-लाईफ, इवियन, सैन-पैलेग्रीमों, पैरियर आदि।
स्वदेशी - घर  का उबला साफ पानी, गंगा, हिमालया, कैच, रेल-नीर, बिसलरी आदि।
(21) उत्पाद - टॉनिक
विदेशी - बूस्ट, पोलसन, बोर्नवीटा, होर्लिक्स, कॉम्पलान,स्पर्ट, प्रोटिनेक्स।
स्वदेशी - बादाम पाक, च्यवनप्राश,अमृत रसायन (पतंजलि), न्यूट्रामूल, माल्टोवा।
(22) उत्पाद - घी एवं खाघ तेल
विदेशी - नेस्ले का घी, डालडा, आई.टी.सी. व हिन्दुस्तान लीवर के सभी ब्राण्ड।
स्वदेशी - घर का गाँव का घी, परम घी, अमूल घी, गाय का देशी घी, सरसों का तेल (पतंजलि)
यह सूची गायत्री परिवार की वेब साईट से ली गई है।
आप स्वदेशी वस्तुओं की लिस्ट की एक्सल फाइल यहाँ से डाउन लोड कर सकते है।
जितना हो सके इसका प्रिंट निकाल कर अपने मित्रों में बाँटे।
नोट:-   
1. यघपि सूची प्रकाशन में पर्याप्त सावधानी रखी गई है तथापि किसी भी नवीन जानकारी से हमें अवश्य अवगत करवाएं जिससे आगामी संस्करण में आवश्यक संशोधन किये जा सकें।
2. आप जहां भी रहते हैं, उसके आसपास ग्रामीणों एवं लघु उघमियों द्वारा आपके दैनिक प्रयोग की कई वस्तुएं बनाई जाती हैं। आप प्राथमिकता के आधार पर उनका प्रयोग कर गांव को स्वावलम्बी बनाएं।

Sunday, January 6, 2013

मानवता का बलात्कार

दरिन्दो ने सिर्फ मासूम का रेप नहीं किया..
रेप किया विश्वास का..
रेप किया पूरी पुरूष जात का..
रेप किया समाज का..
रेप किया इन्सानियत का..
रेप किया माँ की कोख का..
रेप किया संस्कृति का..
रेप किया उस भावना का,
जिसके कारण पड़ोस की बिटिया गोद मेँ खेल सकती थी,

अनजान को भी चाचा ताऊ भैया बोल सकती थी..
रेप किया उस विश्वास का जिसके कारण पुरूषो को संरक्षक मानती थी..
एक छोटी सी भद्दी सी बात कहुँगा मैँ,
मेरे सामने चाहे नग्न और अर्द्धनग्न युवती भी हो तो कुकर्म का ख्याल नहीँ आता दिल मेँ मेरे..
..और कुकर्मी को कपड़ो और उम्र से कोई फर्क नहीँ पड़ता उसके लिये पूरे कपड़ो वाली महिलाये भी उपभोग और कुचेष्टा के लायक दीखती है।
ध्यान रखे मैँ नग्नता का समर्थक नहीँ मगर बलात्कार के लिये नग्नता को जिम्मेदार नहीँ मानता।
क्योँकी माँस कितना भी लजिज हो शाकाहारी नहीँ खाता,
क्योंकी उसके दिमाग मेँ होता है की धर्मभ्रष्ट हो जायेगा।
या नहीँ खाना तो नहीँ खाना।
।।ये मेरी सोच है आपकी सोच मुझे पता नहीँ,
मैँ बस इतना जानता हुँ की कपड़ो के कारण मेरी मानसिक स्थिति कुकर्म की स्थिति तक विचलित नहीँ होती है।
साभार:- सन्नी कुमार तिवारी अविनाश

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