Sunday, October 21, 2012

जख्म जो भरे नहीं

के के तिवारी
रिटायर्ड मेजर जनरल की जुबान से
19 अक्तूबर की रात मैंने गोरखाओं के साथ बिताई. मेरा इरादा था कि 20 अक्तूबर की सुबह मैं राजपूतोंके पास जाऊँ लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. इसके बाद तो जैसा चीनियों ने चाहा वैसा मुझे करना पड़ा.अगली सुबह मैं राजपूतों के पास गया ज़रूर, लेकिन एक युद्ध बंदी के तौर पर. 20 अक्तूबर की सुबह ज़बरदस्त बमबारी की आवाज सुन कर गहरी नींद से मेरी आँख खुली.मैं बंकर से बाहर आया
और किसी तरहगिरते-पड़ते सिग्नल्स के बंकर तक पहुँचा जहाँ मेरी रेजिमेंट के दो सिग्नल मैन मुख्यालय से रेडियो संपर्क बरकरार रखने की कोशिश कर रहे थे.टेलिफ़ोन लाइनें कट गई थीं. लेकिन किसी तरह ब्रिगेड मुख्यालय से रेडियो संपर्क स्थापित हो गया. मैंने उनको ज़बरदस्त गोलाबारी की सूचना दी.
सन्नाटा और फिर गोलीबारी
उस ज़माने में मैं अपने पास 9 एमएम की ब्राउनिंग ऑटोमेटिक पिस्टल रखता था. मेरे ज़हन में ख़्याल आया कि मेरे शव के पास ऐसीपिस्टल नहीं मिलनी चाहिए जिससे एक भी गोली न चलाई गई हो. इसका इस्तेमाल होना चाहिए चाहे हमारी हालत कितनी भी दयनीय क्यों न हो."थोड़ी देर में गोलाबारी रुक गई और एक गहरा सन्नाटा छा गया. थोड़ीदेर बाद पहाड़ की ऊँचाइयों से छोटे हथियारों से रह-रह कर फ़ायरिंग होने लगी और मैंने देखाकि लाल सितारे लगी खाकी वर्दी पहने चीनी सैनिक नीचे उतरते हुए कमर से स्वचालित हथियारों से फ़ायरिंग करते हुए हमारे बंकर कीतरफ बढ़ रहे हैं.तभी मुझे अहसास हुआ कि बटालियन के सभी लोग मुझे और मेरे दो सिग्नल मेन (जो उनके यहाँ मेहमान के तौर पर आए थे) को छोड़ कर कब के पीछे जा चुके थे.मैंने किसी चीनी सैनिक को इतने पास से पहले कभी नहीं देखा था. मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा. चीनियों का पहला जत्था हमें पीछे छोड़ते हुए आगे निकल गया.हम अभी सोच ही रहे थे कि बंकर से बाहर निकलें और ब्रिगेड मुख्यालय की तरफ बढ़ना शुरू करे कि हमें चीनी सैनिकों का दूसरा झुंड नीचे उतरता हुआ दिखाई दिया.वह भी पहले की तरह रह-रह कर फ़ायरिंग कर रहा था. लेकिन यह जत्था काफी व्यवस्थित ढंग से एक एक बंकर की तलाशी लेते हुए आगे बढ़ रहा था. वह बंकरों में ग्रेनेड्स फेंक रहे थे ताकि यह सुनिश्चत कर सकें कि उनमें कोई भारतीय सैनिक ज़िंदा न बच सके.
ज़ख्म, जो भरे नहीं
जैसे ही दो चीनी सैनिक हमारे बंकर की तरफ बढ़े. मैंने पिस्टल की पूरी क्लिप उन पर खाली कर दी. पहले चीनी की बांई आँख के ऊपर गोली लगी और वह वहीं गिर गया और नीचे लुढ़कता चला गया.वह मर ही गया होगा क्योंकि न तो वह चिल्लाया और न ही उसने कोई दूसरी आवाज निकाली. दूसरे चीनी के कंधे में गोली लगी और भी नीचे गिर गया.इसके बाद तो जैसे आफ़त आ गई. गोलियां बरसाते और चिल्लाते हुए कई चीनी सैनिक हमारे बंकर की तरफ बढ़ आए. एक सिग्नल मैन तो गोलियोंसे बुरी तरह छलनी हो गया.मुझे अब भी याद है कि उसके शरीर से इस तरह खून निकल रहा था जैसे किसी नल से दबाव के साथ पानी निकलता है.इसके बाद दो चीनी सैनिक हमारे बंकर में कूदे थे, उन्होंने राइफ़ल की बट से मुझ पर प्रहार किया था और मुझे खींचते और धक्के मारते हुए बंकर से बाहर ले आए थे. मुझे मार्च करते हुए थोड़ी दूर ले जाया गया और मुझसे बैठने के लिए कहा गया.बेइज्जतीचीनी कैप्टेन ने मुझे मारा और अपनी सीमित अंग्रेज़ी में मुझ परचिल्लाया- बेवकूफ़ कर्नल. बैठ जाओ. तुम कैदी हो. जब तक मैं तुम से कहूँ नहीं, तुम हिल नहीं सकते. वर्ना मैं तुम्हें गोली मार दूँगा."थोड़ी देर बाद एक चीनी अफ़सर आया जो टूटी फूटी अंग्रेज़ी बोल सकताथा. उसने मेरे कंधे पर लगे मेरे रैंक को देख लिया था और वह मुझसे बहुत बेइज़्जती से पेश आ रहा था.मेरे पास ही एक गोरखा सैनिक पड़ा हुआ था जो बेहोश था. कुछ क्षणों के लिए जब उसे होश आया तो उसने मेरी तरफ देखा और शायद मुझे पहचान कर कहा- साब पानी.मैं कूद कर उसकी मदद करने के लिए आगे बढ़ा, तभी चीनी कैप्टेन ने मुझे मारा और अपनी सीमित अंग्रेज़ी में मुझ पर चिल्लाया- बेवकूफ़ कर्नल. बैठ जाओ. तुम कैदीहो. जब तक मैं तुम से कहूँ नहीं, तुम हिल नहीं सकते. वर्ना मैं तुम्हें गोली मार दूँगा.थोड़ी देर के बाद हमें नामका चू नदी के बगल में एक पतले रास्ते परमार्च कराया गया.पहले तीन दिनों तक हमें कुछ भी खाने को नहीं दियागया, फिर ले में हमें पहली बार उबले हुए नमकीन चावलों और सूखी तली हुई मूली का खाना दिया गया.
हृदयविदारक दृश्य
हम 26 अक्तूबर को चेन ये के युद्धबंदी शिविर में पहुँचे. मुझे पहले दो दिनों तक एक अंधेरे और सीलन भरे कमरे में अकेले रखा गया.इसके बाद कर्नल रिख को मेरे कमरे में लाया गया जो बुरी तरह घायल थे.शिविर में हमे चार हिस्सों में बांटा गया था. अफसरों और जवानों को अलग अलग रखा गया था. हर समूह कीअपनी अलग रसोई थी जहाँ चीनियों द्वारा चुने गए भारतीय सैनिक सबके लिए खाना बनाते थे.नाश्ता सुबह सात से साढ़े सात के बीच मिलता था. दोपहर के खाने का समय था साढ़े दस से ग्यारह बजे तकऔर रात का खाना तीन से साढ़े तीन बजे के बीच दिया जाता था.जिन घरों में हमें ठहराया गया था,उनकी खिड़कियां और दरवाज़े गायब थे. शायद चीनियों ने उनका इस्तेमाल ईधन के तौर पर कर लिया था. मैं समय बिताने के लिए अपने कमरे में ही चारों तरफ घूमता था.कड़कड़ाती सर्दीअपने सैनिकों को बिना फ़ीते के फटे हुए जूतों और बिना मोज़ों के कैदी के रूप में मार्च करते हुए देखना बहुत हृदयविदारक दृश्य था.सैनिकों की जर्सियाँ फटी हुई थी कुछ लोग जो कोट पहने हुए थे, उनके बटन गायब थे. सिर्फ़ आधे लोगों के पास दो कंबल थे, बाकियों के पास सिर्फ एक कंबल था और सिर्फ दस फ़ीसदी सैनिकों के पास स्लीपिंग बैग्स थे."पहली दो रातें तो हम ठंड में ठिठुरते रहे. हमें जब अंदर लाया जा रहा था तो हमने देखा कि वहाँ पर पुआल का ढेर लगा हुआ है. हमने चीनियों से पूछा कि क्या हम इनका इस्तेमाल कर सकते हैं. सौभाग्य से चीनियों ने हमारी यह गुज़ारिश मान ली. इसके बाद तो हमने इस पुआल को गद्दे के तौर पर भी इस्तेमाल किया और कंबल के तौर पर भी.आठ नवंबर को जब चीनियों ने हमें बताया कि तवांग पर उनका कब्ज़ा हो गया है, हम बहुत ही ज्यादा विचलित हो गए. जब तक हमें कुछ भी अंदाज़ा नहीं था कि लड़ाई किस तरफ जा रही है.उन्होंने कहीं से पता लगा लिया कि मुझे 4 नवंबर 1942 में भारतीय सेना में कमीशन मिला था. इसलिए 4 नवंबर 1962 को एक चीनी अधिकारी, भारतीय सेना में मेरे शामिल होने की बीसवीं वर्षगाँठ मनाने के लिए वाइन की एक छोटी बोतल लेकर मेरे पास आया.भारतीय सैनिकों की भावनाओं पर असर डालने के लिए चीनी खास त्योहारों पर विशेष खाना देते थेऔर भारतीय फ़िल्में दिखाते थे.हमारे शिविर में एक बहुत ही सुंदर चीनी लेडी डॉक्टर थी जो कभी कभी रिख को देखने आती थी. सच बताऊँ तो हम सब लोगों को उससे प्यार हो गया था.
रेडक्रॉस से पार्सल
सैकड़ों की संख्या में भारतीय सैनिकों को युद्धबंदी बनाया गया थादिसंबर के अंत तक रेड क्रॉस ने भारतीय युद्ध बंदियों के लिए दो पार्सल भेजे. एक पैकेट में गर्म कपड़े थे, जर्मन बैटिल ड्रेस, गर्म बनियान, मफ़लर, टोपी, गर्म कमीज़, जूते और तौलिया. दूसरे पैकेट में खाने का सामान था, साठेचॉकलेट, दूध के टिन्स, जैम, मक्खन,मछलियाँ, चीनी के पैकेट, आटा, दाल,सूखी मटर, नमक, चाय, बिस्किट, सिगरेट और विटामिन की गोलियाँ.16 नवंबर को पहली बार हमें घर पत्र लिखने की इजाज़त दी गई. हम चार लेफ़्टिनेंट कर्नलों को घर तार भेजने की अनुमति भी दी गई. हमारे पत्र सेंसर होते थे इसलिए हम कोई ऐसी बात नहीं लिख सकते थे जो चीनियों को बुरी लगे.एक पत्र के अंत में मैंने लिखा किमुझे रेडक्रॉस के जरिए कुछ गर्म कपड़े और खाने की चीजें भेजो. मेरी चार साल की बेटी आभा ने इसकाअर्थ यह लगाया और उसने अपनी माँ से कहा भी कि लगता है डैडी को ठंड लग रही है और वह भूखे भी हैं.चीनी अक्सर पब्लिक ऐड्रेस सिस्टम पर भारतीय संगीत बजाते थे. एक गाना बार-बार बजाया जाता था और वह था लता मंगेशकर का गीत, आजा रे मैं तो कब से खड़ी इस पार.....यह गाना सुन कर हमें घर की बुरी तरह से याद आने लगती थी.बहादुर शाह जफर की गजलें हमने इस दौरान चीन के सुइयों से किए जाने वाले इलाज का कमाल भी देखा. हमारे दोस्त रिख की माइग्रेन की समस्या हमेशा के लिएजाती रही. इसमें उस खुबसूरत लेडी डॉक्टर की भूमिका थी या सुइयों की, आप अंदाज़ा लगा सकते हैं."हमें उस समय बहुत आश्चर्य हुआ जब एक दिन एक चीनी महिला ने आ कर हमें बहादुर शाह ज़फ़र की कुछ गज़ले सुनाईं.हमारे साथी रतन और इस महिला ने एकदूसरे को ज़फ़र के लिखे शेर सुनाए जो उन्होंने दिल्ली से निकाले जाने के बाद रंगून में लिखे थे. शायद यह उर्दू बोलने वाली महिला लखनऊ में कई सालों तक रही होगी.हमने
चीनियों ने तय किया कि भारत भेजने से पहले हमें चीन का दर्शन कराया जाए. वुहान में 10 और भारतीय अफसर युद्धबंदी हमसे आ करमिल गए. इनमें मेजर धन सिंह थापा भी थे जिन्हें वीरता के लिए परमवीर चक्र दिया गया था.बीबीसी सुनने की आजादीलेफ्टिनेंट कर्नल रिख और केके तिवारी चीन की जेल से छूटने के बादयहाँ पर पहली बार हमें आज़ादी से रेडियो सुनने की अनुमति दी गई. और हमने चीन में रहते हुए पहली बार ऑल इंडिया रेडियो और बीबीसी को सुना.चीन में घूमने के दौरान एक बेहतरीन कपड़े पहने हुए चीनी पूरे समय तक हमारे साथ रहा. हम उसको जनरल कह कर पुकारते थे. उनकेपीछे हमेशा एक दूसरा चीनी चलता था जो उसके लिए कुर्सी खींचता था और चाय बनाता था. हम उसे जनरल का अर्दली कहा करते थे.जब हमें भारत वापस भेजने का समारोह हो रहा था, तो चीन की तरफ से कागजों पर दस्तखत करने वाला व्यक्ति वह ‘अर्दली’ था और दस्तखत करने के उसे कलम पकड़ा रहा व्यक्ति ‘जनरल’ था.
सुबह 9 बजे हमने कुनमिंग से कलकत्ता के लिए उड़ान भरी. दोपहर 1 बज कर बीस मिनट पर हम वहाँ लैंड करने वाले थे. लेकिन हमारा जहाज बहुत देर तक ऊपर ही चक्कर लगाता रहा.विमान चालक ने घोषणा की कि विमान के पहिए नहीं खुल पा रहे हैं और हो सकता है कि हमें क्रैश लैंड करना पड़े.अंतत: हम दो बज कर तीस मिनट पर दमदम हवाई अड्डे पर उतरे. किसा भीस्थिति से निपटने के लिए वहाँ दमकलों की पूरी कतार खड़ी थी.जब विमान हवा में था तो हम सोच रहे थे कि इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि चीन की इतनी मुसीबतों से बचने के बाद हम भारत में क्रैशलैंड करते हुए मरने जा रहे थे!
(बीबीसी संवाददाता रेहान फ़ज़ल से बातचीत पर आधारित)
साभार:-) बीबीसी की वेबसाईट से
मेजर केके तिवारी ने 6 महिने युध्द बन्दी के रूप में चीन में बताये।

Saturday, October 20, 2012

आज भी दिलों मे जिन्दा है 1962 का दर्द

1962 के भारत-चीन युद्ध पर सबसे सटीक सुर्खी द लंदन इकॉनामिस्ट ने लगाई थी-
जब कोहरा छँटा तो चीनी हर जगह मौजूद थे. 18 नवंबर आते-आते सेला बिना लड़ाई के चीनियों के हाथ पड़ चुका था.अफवाहें तो यहाँ तक थीं कि चौथी कोर को गुवाहाटी जाने के लिए कह दिया गया था. सैनिकों के काफ़िले पश्चिम की तरफ बढ़ रहे थे. तेज़पुर को खाली करने के लिए कह दिया गया था
और ननमती तेल शोधक कारखाने को उड़ाए जाने की बात चल रही थी.तेज़पुर के उपायुक्त का कहीं अता-पता नहीं था. वे डर कर भाग चुके थे. असम सरकार ने राणा केडीएन सिंह से कहा था कि वह लड़खड़ाते हुए प्रशासन की बागडोर संभालें.तेज़पुर के असैनिक नागरिकों को नाव से पश्चिमी किनारे पर ले जाया जा रहा था.
अधिकतर परिवार एक-दो सूटकेसों और छोटे ट्रंकों में जितना सामान भर सकते थे, भर कर भोमारागुड़ी घाट की तरफ बढ़ रहे थे ताकि वे ब्रह्मपुत्र नदी पार कर दक्षिणी असम की ओर बढ़ सकें.कुछ परिवार तो कड़कड़ाती ठंड मेंखुले में रात बिता रहे थे ताकि दूसरे दिन तड़के सुबह ही उनका नंबर आ जाए.तेज़पुर से कूचउनका एक ही लक्ष्य था कि किसी तरहकलकत्ता पहुँचा जाए. इस पूरे कूच में नावों के अलावाकारों, बसों, साइकिलों और बैलगाड़ियों तक का सहारा लिया जा रहा था. कुछ लोग तो पैदल ही अपने घरों से निकल पड़े थे.
"ब्रह्मपुत्र के उत्तरी किनारे पर रहने वाले ज्यादातर अंग्रेज़ चाय बागान मालिकों ने अपनी संपत्ति अपने मातहतों और क्लर्कों के हवाले कर दी थी. अपनेपालतू जानवरों को वह या तो बांट रहे थे या उन्हें गोली मार रहे थे.उनका एक ही लक्ष्य था कि किसी तरहकलकत्ता पहुँचा जाए. इस पूरे कूच में नावों के अलावा कारों, बसों, साइकिलों और बैलगाड़ियों तक का सहारा लिया जा रहा था. कुछ लोग तो पैदल ही अपने घरों से निकल पड़े थे.राणा लाउडस्पीकर से उदघोषणा कर रहे थे कि वह शाम छह बजे दक्षिणी किनारे जाने वाली आखिरी फेरी पर सवार होंगे और बचे हुए लोगों के लिए नदी पार करने का यह आखिरी मौका होगा.तेज़पुर एक भुतहा नगर दिखाई दे रहा था.
स्टेट बैंक ने अपने यहाँ रखी सारी करेंसी में आग लगा दी थीऔर अधजले नोटों के टुकड़े हवा में उड़ रहे थे.सिक्कों को पास के तालाब में फेंक दिया गया था.मानसिक रोगी छोड़े गएदेश को संबोधित अपने भाषण में प्रधानमंत्री नेहरू असम के लोगों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त कर रहे थे. उत्तर पूर्व में रहने वाले लोग नेहरू के उस भाषण का ज़िक्र करते हुए अभी तक कहते हैं कि भारत सरकार ने तो उन्हें तभी विदाई दे दी थी.
"प्रशासन ने मानसिक अस्पताल के ताले खोल दिए थे और 20-30 विक्षिप्त लोग शहर में यहाँ-वहाँघूम रहे थे.उन सरकारी कागजातों में भी आग लगाई जा रही थी जिन्हें चीनी किसी भी हालत में पढ़ नहीं सकते थे.देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू असम के लोगों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त कर रहे थे. उत्तर पूर्व में रहने वाले लोग नेहरू के उस भाषण का ज़िक्र करते हुए अभी तक कहते हैं कि भारत सरकार नेतो उन्हें तभी विदाई दे दी थी.19 नवंबर की सुबह तेज़पुर में एक पत्ता तक नहीं खड़क रहा था.... लगता था जैसे सब कुछ एक जगह पर रुक गया था!
सौभाग्य से चीनी तेज़पुर से 50 किलोमीटर पहले ही रुक गए थे.युद्ध विरामचीनी सैनिकों के आगे हथियार डालते भारतीय सैनिक19 नवंबर की आधी रात चीनी रेडियो ने घोषणा की कि उसने तुरंत प्रभाव से एकपक्षीय युद्ध विराम कर दिया है, बशर्ते भारतीय सेना भी उसका पालन करे.आकाशवाणी का 20 नवंबर की सुबह का बुलेटिन अब भी सीमाओं पर भारतीय सैनिकों के वीरता से लड़ने के समाचार सुना रहा था. किसी ने भी थक कर सोए हुए प्रधानमंत्री को जगा कर चीन की इस नई पेशकश के बारे में बताने की जुर्रत नहीं की थी.यह एक विडंबना थी कि चाहे वह जवानहो या जनरल, यह जानने के लिए पीकिंग रेडियो का सहारा ले रहा था कि उसके अपने युद्ध के मैदान में क्या हो रहा था.21 नवंबर तक तेज़पुर में ज़िंदगीधीरे-धीरे सामान्य हो चली थी. गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री लोगों का ढाँढस बढ़ाने वहाँ पहुँचे थे. दो दिन बाद इंदिरा गाँधी ने भी वहाँ का दौरा किया थाऔर जिला प्रशासन के लोग वापस वहाँ पहुँचना शुरू हो गए थे.
रेहान फ़ज़ल
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
तस्वीर में देखे 1962 में घरों को छोडते लोग

Sunday, October 14, 2012

गौ रक्षा के लिये पॊलीथीन का त्याग जरूरी है।

गाय और पर्यावरण प्रकृति की अमोल धरोहर है। जहां गाय की सेवा होती है वहां रोग नहीं रहते और भूकंप जैसी आपदाएं नहींआतीं। पालीथिन गौ हत्या का सबसे बड़ा कारण है। लोग पालीथिन सड़कों पर डाल देते हैं और गाय उसे खा जाती है जिससे उसकी मृत्यु हो जाती है।स्वतंत्रता के बाद की सरकारों ने गौ हत्या पर रोक नहीं लगाकर करोड़ों लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ किया है।
सत्ता में बैठे लोगों ने ही पालीथिन को बढ़ावा दिया है, जिससे गौ हत्या के साथ पर्यावरणको भी खतरा उत्पन्न हो गया है।
गाय स्वतंत्रता आंदोलन की सूत्रधार है।
कानपुर गौशाला में गाय के गोबर से कपड़ा और आगरा गौशाला में टाइल्स बनाए जा रहे हैं।गाय का गोबर परमाणु शक्ति से रक्षा करने में सक्षम है। जरूरत है गाय पर वैज्ञानिक रिसर्च करने की।
गाय की सेवा करने वालों के लिए स्वर्ग के द्वार खुले हैं। गौ हत्या करने वालों का विनाश निश्चित है।
गौ कथा से सृष्टि का कल्याण होगा। गौ माताके चरण जिस मिट्टी पर पड़ते हैं वह चमत्कारिक प्रसाद बन जाती है। गाय के चरणों का स्पर्श की हुई मिट्टी का टीका माथे पर लगाने से असीम ऊर्जा की प्राप्ति होती है। गौ और कन्या एक हीहैं। गाय में संस्कारों का भंडार है। गऊ माता के पांच गव्य दूध, दही, गौ मूत्र, धृत व गोबर मिलते हैं। पहली रोटी गाय के लिए निकालनी चाहिए। इससे घर मेंसंपन्नता आती है गौ हत्या रोकने के लिए सभी धार्मिक और सामाजिक संगठनों को एक मंच पर आना होगा।
गोपाल मणी महाराज के प्रवचन से

Thursday, October 11, 2012

सर्व कल्याणमयी गौ माता

गाव: पवित्रा माङ्गल्या गोषु लोका: प्रतिष्ठिता:।
(अग्रिपुराण 292)
गऊएं पवित्र और मङ्गलदायिनी हैं। समस्त लोक गौ में ही प्रतिष्ठित हैं। गऊओं का गोबर औरगोमूत्र परम श्रेष्ठ है। उससे अलक्ष्मी (दरिद्रता) का नाश होता है। गऊओं के सींगों से खुजलाया हुआ जल सारे पापों का नाश करता है।गोबर, गोमूत्र, गो-दुग्ध, गोदधि, गो-घृत, और गो-रोचन इस षडङ्ग का पान श्रेष्ठ है और दु:स्वप्रादि दोषों का नाशक है।
गो-रोचन राक्षसों और विष का नाश करने वाला है। गऊ को ग्रास देने से मनुष्य स्वर्ग में जाता है। जिसके घर में गऊएं दुखी रहती हैं वह मनुष्य नरकों में जाता है।
‘यद्गृहे दु:खिता गाव: स याति नरकं नर:।’
जो मनुष्य दूसरे की गऊ को ग्रास देता है वह स्वर्ग को प्राप्त होता है तथा जो नित्य गऊओं की सेवा में लगा रहता है वह ब्रह्मलोक में जाता है। गोदान करके, गौ की महिमा का कीर्तन करकेऔर गऊओं की रक्षा करके मनुष्य अपने कुल का उद्धार कर सकते हैं।
गऊओं के श्वास से पृथ्वी पवित्र होती है और उनके स्पर्श से पापों का नाश होता है-
‘गवां श्चासात् पवित्रा भू: स्पर्शनात् किल्बिषक्षय:।’
प्राचीन काल में लोकपालों ने समस्त अशुभ का नाश करने के लिए गोबर आदि का व्यवहार किया था। गौ सेवक सारी कामनाओं को प्राप्त करके स्वर्ग में गमन करता है।
पोस्ट साभार:- पंजाब केसरी

गौ माता की करूण कहानी गौ माता की जुबानी

प्यारे भारत वासियों।
भारत एक ऎसा देश है जहाँ मेरे उत्थान और विकाश की बातें आदि काल से होती आई है। ऋषि मुनियों की पंरम्पराऒ को आत्मसात करने वाले इस देश में मुझे माता और पूज्य की संज्ञा दी जाती है। गौमाता, कामधेनु, सुरभी इत्यादी मेरे ही नाम है। सभी जानते है देव दानवों द्वारा किये गये सागर मंथन से मेरा जन्म हुआ, देवताओं द्वारा में पूजित हुई और ऋषि मुनियों द्वारा पालित और पोषित हुई।
सृष्टी के निर्माता भगवान विष्णु ने कृष्ण अवतार लेकर मेरी सेवा की इस कारन वो गोपाल और गोबिन्द कहलाये।असंख्य लोगो ने मेरी रक्षार्थ बलिदान दिये। ग्रन्थ और पुराणों की मै विषय वस्तु  बनी। मै मनुष्य के जन्म से लेकर आजतक निरन्तर प्राणी मात्र की सेवा ही करती हूँ।आप लोगो की इतनी सेवा के वाबजूद मुझे आज मनुष्य ने दिया ही क्या है।
मुझे खाने के लिये घा चारा नहीं मिलता। भूक और प्यास से ग्रस्त जीवन काट रही हूँ। जब मेरी क्षुदा शान्त नहीं होती तब मै दर दर भटकती हूँ कभी इस दर तो कभी उस दर। कभी मै सब्जी मंण्डी में डंडे खाती हूँ। मुझे जब प्यास लगती है तो मैं मानव मूत्रालय में जाकर गन्दा पानी पीती हूँ। पॊलीथीन की थैलिया में भी खाती रहती हूँ ।
आप सब पॊलीथीन सडक पर फैक देते हो और मैं मजबूरी में उन्हे खाती हूँ।
हे मनुष्यों मै तुम्हे धन देती हूँ मेरा बछडा तुम्हे अन्न देता है। हे संवेदन शील इन्सानों दुनिया में एसी कौनसी माँ है जिसके दौनों पैर बाँध दिये जाते है। उसके सामने उसके बच्चे को रस्सी से बाँध दिया जाता है फिर मेरा दूध निकाला जाता है। कई लोग तो मेरी काया में निर्दयता पूर्वक इंजेक्शन चुबो कर मेरा दूध निकाल लेते है।
कई बार तो मेरे बछडे को भी दूध नहीं मिल पाता लेकिन मै तुम्हारा पेट भरती हूँ। जब मेरा दूध बन्द हो जाता है और मेरा बछडा बैल बन कर बूडा हो जाता है तब तुम लोग हमें कसाईयों को बेच देते हॊ। मै कत्लखानों मै कसाइयों के सम्मुख ठेल दी जाती हूँ। चार दिनों तक मुझे भूका रखा जाता है ताकि मेरा हीमोग्लोबिन गलकर माँस से चिपक जाये। फिर मुझे घसीट कर लाया जाता है क्योंकी मै मूर्छित रहती हूँ। मुझ पर 200 डिग्री सेल्सियस वाष्प में उबलता हुआ पानी डाला जाता है। मै तडप उठती हूँ । हे मेरा दूध पीने वालों मै तुम्हे याद करती हूँ ।मुझे कठोरता से पीटा जाता है ताकि मेरा चमडा आसानी से उतर जाये। मेरी दौनो टाँगे बाँध कर मुझे उल्टा लटका दिया जाता है। फिर मेरे बदन से सारा चमडा निकाल लिया। जाता है। सुनों जीव धारियों अभी भी मैने प्राण नहीं त्यागे है। मै कातर निगाहों से देखती हूँ शायद इन कसाइयों के मन में मनुष्यता का जन्म हो। किन्तु इस समय मुझसे पोषित होने वाला कोई भी मानव मुझे बचाने नहीं आता। मेरे चमडे की चाहत रखने वाले दुष्ट कसाई मेरी जीवित अवस्था में ही मेरा चमडा उतार लेते है और तडप कर मै प्राण त्याग देती हूँ।
सुनों धर्म प्राण मनुष्यों राम कृष्ण,नानक महावीर की जय जय कार करने वालों के देश में मेरी करुण पुकार सुनने वाला कोई नहीं है। मुझे तो बस एक बात का समाधान चाहिये तुमने मेरा दूध पिया है  मेरा बछडा कन्धे पर हल खींचता है, गाडी खींचता है, कोडे खाता है। हमें कीले चुबोइ जाती है फिर भी हम तुम्हारे घर दूध,अन्न, फल और सब्जिया पहुँचाते है। मै और मेरा बेटा तुम्हे चमडा माँस हड्डिया दूध सब कुछ तुम्हे देते है। आज जो शहर बसे हुऐ हो वो सब मेरे ही नाम की गोचर और गौ चारण भूमी पर बसे हुये है। सच कहूँ तो मेरी इस भूमी पर भूमाफिया और गन्दे राजनेताओ ने कब्जा किया हुआ है। शास्त्र कहते है गोचर भूमी पर कब्जा करने वाले पातक होते है इस पाप से मुक्ति का शास्त्रों में कोई विधान है ही नहीं। मेरी भूमी पर कब्जा कर लिया है तभी तो मै शहरों में आयी हूँ और वहाँ से भी मुझे बे दखल किया जा रहा है। इस पावन और पवित्र भारत भूमी पर ऐसा कोई नहीं है क्या जो धर्म और कानून का पालन कर मेरे प्राण बचाये। तुम्हारे द्वारा किये गये क्रूरतम हत्याचारों को सहकर भी मै तुम्हे श्राप नहीं दे सकती ना क्योंकि मै माँ हूँ ना। मैने अपना कर्तव्य निभाया व और परमेश्वर तुम्हे शक्ति दे कि तुम भी अपना कर्तव्य निभाओं
गाय माता की करुण पुकार:-
"ए हिंद देश के लोगों, सुन लो मेरी दर्द कहानी।
क्यों दया धर्म विसराया, क्यों दुनिया हुई वीरानी !!
जब सबको दूध पिलाया, मैं गौ माता कहलाई,
क्या है अपराध हमारा, जो काटे आज कसाई।
बस भीख प्राण की दे दो, मै द्वार तिहारे आई
मैं सबसे निर्बल प्राणी, मत करो आज मनमानी॥
जब जाउँ कसाईखाने, चाबुक से पीटी जाती,
उस उबले जल को तनपर, मैं सहन नहीं कर पाती।
जब यंत्र मौत का आता, मेरी रुह तककम्प जाती, मेरा कोई साथ न देता, यहाँ सब की प्रीत पहचानी॥
उस समदृष्टि सृष्टि नें, क्यों हमें मूक बनाया
न हाथ दिए लड़नें को, हिन्दु भी हुआ पराया।
कोई मोहन बन जाओ रे, जिसने मोहे कंठ लगाया,
मैं फर्ज़ निभाउँ माँ का, दूँ जग को ममता निशानी॥
मैं माँ बन दूध पिलाती, तुम माँ का माँस बिकाते,
क्यों जननी के चमड़े से, तुम पैसा आज कमाते।
मेरे बछड़े अन्न उपजाते, पर तुम सब दया न लाते,
गौ हत्या बंद करो रे, रहनेंदोवंश निशानी
हे हिन्दु वीरों आपकी गौ माँ आपकी तरफ अश्रु पूर्ण नयनों से निहार रही है।
आपकी माँ
सुरभी
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॥जय गौमाता॥
॥जय गोपाल॥

Tuesday, October 9, 2012

राजीव भाई के ऑडियो व्याख्यान (Lectures by rajivdixit audio )

एक व्यक्ति जिसने आईना दिखाया पूरी भारतीय जनता को कि उन्हे कैसे लूटा गया और कैसे लूटा जा रहा है।
मै बात कर रह रहा श्री राजीव भाई की जिन्होने भारत में स्वदेशी आन्दोलन की नींव रखी। आज वो हमारे बीच में नहीं है लेकिन उनके विचार आज भी हमारे बीच में है। राजीव भाई जो काम बीच में छोड कर चले गये हम सबका कर्तव्य बनता है हम उसे पूरा करे। यह हमारा कर्तव्य भी है और उनके प्रति सच्ची श्रन्धाजंली।
इस कडी को आग बडाते हुऎ मैने उनके कुछ ओडियो व्याख्यान संकलित किये है जिन्हे आप आसानी से डाउनलोड कर सकते है।

राजीव जी के ये व्याख्यान भारत स्वाभिमान द्वारा उपलब्ध “स्वाभिमान शंखनाद” 20 MP3 CD सेट से हैं
इन्हे मैने
राजीव दीक्षित वेबसाइट से संकलित किया है।

भारत के सामाजिक एवं चारित्रिक पतन का षड़यंत्र

संगठन की मर्यादा एवं सिद्धांत

भारत का स्वर्णिम अतीत

भारत की विश्व को देन

भारत से हुई ऐतिहासिक  भूलें

भारत देश में गुलामी की निशानियाँ

विदेशी कम्पनियों की लूट एवं स्वदेशी का दर्शन

मांसाहार से हानियाँ – ग्लोबल वार्मिंग

स्वदेशी से स्वावलंबी भारत

अंग्रेजी भाषा की गुलामी

भारत का सांस्कृतिक पतन

विषमुक्त कृषि

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व्यवस्था परिवर्तन की क्रांति

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Monday, October 8, 2012

धरती का स्वर्ग - गोधाम पथमेडा

अगर कोई पूछे धरती पर स्वर्ग कहाँ है तो बिना सोचे समझे पथमेडा का नाम बता देना।
भारत बहुत बडा देश है हरेक भारत वासी के लिये संम्भव नहीं पोता कि पथमेडा जाकर गौ माता के दर्शन कर सके। जो मित्र भारत के विभिन्न शहरों मे रहते है उनके लिये गौ माता के आशीर्वाद से पथमेडा का दर्शन कराने का प्रयास कर रहा हूँ।
आनंदवन पथमेड़ा भारत देश की वह पावन व मनोरम भूमि हैं जिसे भगवान श्री कृष्णने कुरुक्षेत्र सें द्वारका जाते समय श्रावण भादों माह में रुक कर वृंदावन से लायी हुई भूमंड़ल की सर्वाधिक दुधारु जुझारु साहसी शौर्यवान सौम्यवान गायों के चरने व विचरनें के लिए चुना था। यह आनंदवन मारवाड़ काठियावाड़ व थारपारकर की गोपालन लोक सन्स्कृति का ललित संयोग हैं।साथ ही भूगर्भ से बह रही पावन सरस्वती व कच्छ के रण में फैली हुई सिंधु तथा धरा पर बहने वाली सावित्री नदी द्वारा जन्म-जन्म के पापों का शमन करनें वाले श्री कृष्ण कामधेनु एवं कल्पगुरु दत्तात्रेय की आराधना का परम पावन त्रिवेणी संगम स्थल है।
सन १९९३ में राष्ट्रव्यापी रचनात्मक गोसेवा अभियान का प्रारम्भ इसी स्थान से हुआ हैं।जिसके तहत सर्वप्रथम श्री गोपाल गोवर्धन गौशाला गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा की स्थापना एवं गोसेवा कार्यकारिणी का गठन करके उसमें संपूर्ण हिंदुऒं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चत किया हैं।
परम पूजनीय स्वामी दत्त शरणानन्द महाराज ने इस स्थान को.स्वर्ग बना दिया है
मेरे को एक दोहा याद आ रहा है
को कवि वर्णन कर सके, पथमेडा का मूल।
इसके कण कण में बसी, गौ चरणों की धूल।।
कुछ विडियो लिंक दे रहा हूँ जिन्हे देख कर आप अपने आप को पथमेडा आने से नहीं रोक पाऒगे। आपको एक पल के लिये अहसास होगा जैसे कि आप पथमेडा में बैठे हो।
श्री गोधाम महातीर्थ पथमेडा भाग I
श्री गोधाम महातीर्थ पथमेडा भाग II
श्री गोधाम महातीर्थ पथमेडा भाग III
कुछ चित्र पोस्ट कर रहा हूँ जो विभिन्न साईटस से संग्रह किये गये।
अगर भारतीय संस्कृति  को  बचाना है तो गौ माता को बचाना ही होगा।





























Sunday, October 7, 2012

घाटी के दिल की धडकन

घाटी के दिल की धड़कन !!

काश्मीर जो खुद सूरज के बेटे की रजधानी था
डमरू वाले शिव शंकरकी जो घाटी कल्याणी था
काश्मीर जो इस धरतीका स्वर्ग बताया जाता था
जिस मिट्टी को दुनिया भर में अर्ध्य चढ़ाया जाता था
काश्मीर जो भारतमाता की आँखों का तारा था
काश्मीर जो लालबहादुर को प्राणों से प्यारा था
काश्मीर वो डूब गयाहै अंधी-गहरी खाई में
फूलों की खुशबू रोती है मरघट की तन्हाई में
ये अग्नीगंधा मौसम की बेला है
गंधो के घर बंदूकोंका मेला है
मैं भारत की जनता का संबोधन हूँ
आँसू के अधिकारों का उदबोधन हूँ
मैं अभिधा की परम्परा का चारण हूँ
आजादी की पीड़ा का उच्चारण हूँ
इसीलिए दरबारों को दर्पण दिखलाने निकला हूँ
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

बस नारों में गाते रहियेगा कश्मीर हमारा है
छू कर तो देखो हिम छोटी के नीचे अंगारा है
दिल्ली अपना चेहरा देखे धूल हटाकर दर्पण की
दरबारों की तस्वीरें भी हैं बेशर्म समर्पण की
काश्मीर है जहाँ तमंचे हैं केसर की क्यारी में
काश्मीर है जहाँ रुदन है बच्चों की किलकारी में
काश्मीर है जहाँ तिरंगे झण्डे फाड़े जाते हैं
सैंतालिस के बंटवारे के घाव उघाड़े जाते हैं
काश्मीर है जहाँ हौसलों के दिल तोड़े जाते हैं
खुदगर्जी में जेलों से हत्यारे छोड़े जाते हैं
अपहरणों की रोज कहानी होती है
धरती मैया पानी-पानी होती है
झेलम की लहरें भी आँसू लगती हैं
गजलों की बहरें भी आँसू लगती हैं
मैं आँखों के पानी को अंगार बनाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

काश्मीर है जहाँ गर्द में चन्दा-सूरज- तारें हैं
झरनों का पानी रक्तिम है झीलों में अंगारे हैं
काश्मीर है जहाँ फिजाएँ घायल दिखती रहती हैं
जहाँ राशिफल घाटी का संगीने लिखती रहती हैं
काश्मीर है जहाँ विदेशी समीकरण गहराते हैं
गैरों के झण्डे भारत की धरती पर लहरातें हैं
काश्मीर है जहाँ देश के दिल की धड़कन रोती है
संविधान की जहाँ तीन सौ सत्तर अड़चनहोती है
काश्मीर है जहाँ दरिंदों की मनमानी चलती है
घर-घर में ए. के. छप्पन की राम कहानीचलती है
काश्मीर है जहाँ हमारा राष्ट्रगान शर्मिंदा है
भारत माँ को गाली देकर भी खलनायक जिन्दा है
काश्मीर है जहाँ देश का शीश झुकाया जाता है
मस्जिद में गद्दारों को खाना भिजवाया जाता है
गूंगा-बहरापन ओढ़े सिंहासन है
लूले - लंगड़े संकल्पों का शासन है
फूलों का आँगन लाशों की मंडी है
अनुशासन का पूरा दौर शिखंडी है
मै इस कोढ़ी कायरताकी लाश उठाने निकलाहूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

हम दो आँसू नहीं गिरा पाते अनहोनी घटना पर
पल दो पल चर्चा होती है बहुत बड़ी दुर्घटना पर
राजमहल को शर्म नहीं है घायल होती थाती पर
भारत मुर्दाबाद लिखा है श्रीनगर कीछाती पर
मन करता है फूल चढ़ा दूं लोकतंत्र की अर्थी पर
भारत के बेटे निर्वासित हैं अपनी ही धरती पर
वे घाटी से खेल रहे हैं गैरों के बलबूते पर
जिनकी नाक टिकी रहती है पाकिस्तानी जूतों पर
काश्मीर को बँटवारे का धंधा बना रहे हैं वो
जुगनू को बैसाखी देकर चन्दा बना रहेहैं वो
फिर भी खून-सने हाथों को न्योता हैदरबारों का
जैसे सूरज की किरणों पर कर्जा होअँधियारों का
कुर्सी भूखी है नोटों के थैलों की
कुलवंती दासी हो गईरखैलों की
घाटी आँगन हो गई ख़ूनी खेलों की
आज जरुरत है सरदार पटेलों की
मैं घाटी के आँसू का संत्रास मिटाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

जब चौराहों पर हत्यारे महिमा-मंडित होते हों
भारत माँ की मर्यादा के मंदिर खंडित होते हों
जब क्रश भारत के नारे हों गुलमर्गा की गलियों में
शिमला-समझौता जलता हो बंदूकों की नालियों में
अब केवल आवश्यकता है हिम्मत की खुद्दारी की
दिल्ली केवल दो दिनकी मोहलत दे दे तैय्यारी की
सेना को आदेश थमा दो घाटी ग़ैर नहीं होगी
जहाँ तिरंगा नहीं मिलेगा उनकी खैर नहीं होगी
जिनको भारत की धरतीना भाती हो
भारत के झंडों से बदबू आती हो
जिन लोगों ने माँ का आँचल फाड़ा हो
दूध भरे सीने में चाकू गाड़ा हो
मैं उनको चौराहों पर फाँसी चढ़वाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

अमरनाथ को गाली दी है भीख मिले हथियारों ने
चाँद-सितारे टांक लिये हैं खून लिपि दीवारों ने
इसीलियें नाकाम रही हैं कोशिश सभी उजालों की
क्योंकि ये सब कठपुतली हैं रावलपिंडी वालों की
अंतिम एक चुनौती देदो सीमा पर पड़ोसी को
गीदड़ कायरता ना समझे सिंहो की ख़ामोशी को
हमको अपने खट्टे-मीठे बोल बदलना आताहै
हमको अब भी दुनिया का भूगोल बदलना आताहै
दुनिया के सरपंच हमारे थानेदार नहीं लगते
भारत की प्रभुसत्ता के वो ठेकेदार नहीं लगते
तीर अगर हम तनी कमानों वाले अपने छोड़ेंगे
जैसे ढाका तोड़ दिया लौहार-कराची तोड़ेंगे
आँख मिलाओ दुनिया के दादाओं से
क्या डरना अमरीका के आकाओं से
अपने भारत के बाजू बलवान करो
पाँच नहीं सौ एटम बम निर्माण करो
मै भारत को दुनिया का सिरमौर बनाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन निकलाहूँ ||

( हरिओम पंवार जी की कविता )

गर्भवती गौ माता की निर्मम हत्या

जालंधर :
शुक्रवार दिनाँक 5/10/12
गढ़ा इलाके में निर्ममता से एक गर्भवती गाय की हत्या कर दी गई। गाय के चारों पैर व गला रस्सी से बांध कर मुंह के रास्ते लंबे सुए जैसे हथियार डाल कर दिल तक वार किया गया था। गाय के अन्य हिस्सों पर भी हथियार मारे जाने के निशान थे।
गाय, जिसे हमारे समाज में माता का दर्जा दिया गया है, की हत्या मात्र कुछ हजार रुपयेके लिए की जाती है। गौ हत्या करने वाले चमड़ीउतार कर मात्र 2500 से लेकर 4000 में बेचते हैं।
गाय के मालिक के बयानों पर पीटर नाम के व्यक्ति के खिलाफ एनीमल क्रूएलिटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर उसकी तलाश की जा रही है।
जब हमारे पैर में कांटा लगता है तो हमे कितना दर्द होता है हम दर्द के मारे चीख पडते है।सोचो जब हमारी गौ माता पर लम्बे लम्बे धार दार हथियारों से वार किये होगें.तो वो कितनी.चीखी होगी चिल्लाई होगी।
तब ना तो कोई.शिवाजी उसे बचाने आये ना ही कोई हिन्दू वीर वहाँ पर था।
निर्दयता की भी कोई सीमा होती है। करीब 7 बजे जब वहां पहुंचे तो मौके का दृश्य बेहद ही भयानक था। खून से सना गाय का शव पड़ाहुआ था और उसकी टांगें बंधी हुई थीं। गाय के गले और गुप्तांग पर तेजधार हथियारों के कई घाव थे।
हे भगवान अगर तुम्हारा कोई अस्तित्व है तो इन गौ हत्यारों के साथ वही सलूक होना चाहिये जो इन्होने गौ माता के साथ किया।
एक गर्भ वती गौ माता की हत्या करने वाले दुष्ट तेरी मौत भी इसी तरह निश्चित है।
इसके लिये कुछ मिडिया लिंक
पंजाब केसरी
जागरण

गाँव गाँव में गौ रक्षा दल बनायें

अगर हर शहर में 1 गौ रक्षा दल हो तो किसी की क्या मजाल जो गौ माता की तस्करी की  तो छोड़ो छु भी न सके..................
किसी भी छोटे से शहर में जाकर देखे राजनैतिक पार्टियों के दल तो मिलेंगे लेकिन गौ रक्षा दल डूडने से भी नहीं मिलेगा
आज किसी भी महा विद्यालय में चले जाईये।अगर किसी लडके से कुछ कहासुनी हो जाये तो वो तुरन्त जेब से अपना फोन निकालकर. Call करेगा थोडी देर में  चार पाँच लडके बाइक्स लेकर तुरन्त वहाँ पहुच जाते है।अगर वो सब लडके चाहें.तो एक गौ रक्षा दल आसानी से बन सकता है । कहीं से भी गाय को प्रताडित करने की कोई सूचना आये तुरन्त वहाँ पहुँच कर उन दुष्टों की वो धुनाई करें की वो जीवन भर गाय की तरफ आँख उठा कर भी ना देख सकें। लेकिन हम एसा नहीं करते क्यों कि हम हिन्दु है हम आस लगाकर बैठे रहते है कि.भगवान आयेगे ऎसा करने के लिये। अग किसी औटो ड्राइवर से झगडा करना हो। या किसी चाय की दुकान वाले को भगाना हो या फिर किसी बस क्डकटर को पीटना हो तो कभी भी अपने दोस्तो को फोन कर दो पलक झपकते ही हाजिर हो जायेगे।
ये बात आजकल तो स्कूलों में भी होने लगी है। रोज बस में या किसी अन्य स्थान पर ये घटनायें आपको दिखाई दे जायेगी।
गौ रक्षा दल का निर्माण आसानी से किया जा सकता है।कुछ मित्र मिलकर इसे आसानी से शुरू कर सकते। हम लोग कोलेजों में भी तो झगडा करने पहुच जाते है तो फिर गौ रक्षा करने क्यों नहीं पहुच सकते

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