Wednesday, August 14, 2013

आज़ादी के 66 साल: नेहरु की वो गलतियां जिन्हें 50 साल बाद भी भुगत रहा है भारत

१९४७ के युद्ध में जब भारत की सेनाये जितने लगी थी अगर २ दिन ओर युद्ध चलता तो पूरा कश्मीर हमारा होता  युद्ध में पकिस्तान की हर होती देख कर जिन्ना ने भारत के नेताओं को पाकिस्तान आकर बातचीत करने का न्योता दिया। इस पर चर्चा के लिए
भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंट बेटेन, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल इकट्ठा हुए। बैठक में जिन्ना के न्योते पर पटेल ने आपत्ति जताई और पाकिस्तान न जाने की सलाह दी। लेकिन नेहरू और माउंट बेटेन जिन्ना के न्योते को लेकर नरम थे। बैठक में तय हुआ कि जिन्ना से बातचीत के लिए पाकिस्तान का दौरा होगा। लेकिन दौरे से ऐन पहले नेहरू की तबियत खराब हो गई। दौरे पर सिर्फ माउंट बेटेन गए। माउंट बेटेन पाकिस्तान गए और जिन्ना से बातचीत की।
तभी अचानक नेहरू ने 2 नवंबर को आकाशवाणी पर राष्ट्र के नाम संदेश में एकतरफा एलान कर दिया कि वे इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाएंगे और भारत या पाकिस्तान में शामिल होने या आज़ाद रहने पर फैसले के लिए कश्मीर के लोगों के बीच जनमत संग्रह कराया जाएगा। नेहरू के उस एलान की कीमत आज भी भारत चुका रहा है। तब से लेकर आज तक यह मुद्दा विवादों से घिरा रहा है और कश्मीर के लोगों के बीच जनमत संग्रह की मांग उठती रही है।

हिंदू कोड बिल 
जवाहर लाल नेहरू ने पहला लोकसभा चुनाव जीतने के बाद हिंदू कोड बिल यह कहते हुए लागू किया कि इससे हिंदू समाज में सुधार आएगा। लेकिन उन्होंने यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करने में असमर्थता जताई थी। हिंदू समाज को यह आपत्ति थी कि अगर सामाजिक सुधार की जरुरत है तो सिर्फ हिंदू समाज ही क्यों देश के सभी धर्मों के लोगों को इसके दायरे में लाया जाना चाहिए। लेकिन नेहरू ने कहा था कि पहले हिंदू समाज से इसकी शुरुआत होनी चाहिए और फिर अन्य धर्मों पर भी इसे लागू किया जाएगा। लेकिन आज तक भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू नहीं किया गया। ऐसी किसी भी कोशिश पर अन्य धर्म के लोग आपत्ति जताते हैं।

तिब्बत पर चीन के हक को दी मंजूरी 
नेहरू चीन से दोस्ती के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक थे। वे चीन को खुश करने के लिए कई तरह के उपाय कर रहे थे। नेहरू ने 1953 में अमेरिका की उस पेशकश को ठुकरा दिया था, जिसमें भारत से सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के तौर पर शामिल होने को कहा गया था। इसकी जगह नेहरू ने चीन को सुरक्षा परिषद में शामिल करने की सलाह दे डाली थी। अगर नेहरू ने उस पेशकश को स्वीकार कर लिया होता तो कई दशकों पहले भारत सामरिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद मजबूत देश के तौर पर उभर चुका होता। 

जवाहर लाल नेहरू की चीन को लेकर दरियादिली का सिलसिला यहीं नहीं थमा। नेहरू ने 29 अप्रैल, 1954 को चीन के साथ पंचशील के सिद्धांत पर समझौता किया था। इस समझौते के साथ ही भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया था। नेहरू ने चीन से दोस्ती की खातिर तिब्बत को भरोसे में लिए बिना उस पर चीन के 'कब्जे' को मंजूरी दे दी। जानकार मानते हैं कि भारत के इस समझौते के बाद से ही हिमालय में भू-राजनैतिक हालात हमेशा के लिए बदल गए। चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने तिब्बत में अपने विस्तार का जो सिलसिला शुरू किया, वह आज भी जारी है। दुनिया की छत कहे जाने वाले तिब्बत में चीन के खिलाफ आंदोलन आज भी चल रहा है। तिब्बत में चीन के पांव पसारने का नतीजा यह हुआ है कि आज उसके हौसले बुलंद हैं और वह न सिर्फ गाहे ब गाहे वास्तविक नियंत्रण रेखा का उल्लंघन कर रहा है बल्कि अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा बताता है। नेहरू की वह गलती भाज भारत पर बहुत भारी पड़ रही है।

चीन ने भोंका पीठ में छुरा 
नेहरू शांति और समझौते के दम पर चीन के साथ सीमा विवादों को सुलझाना चाहते थे। उनकी मंशा पर किसी को शक नहीं था। लेकिन नेहरू चीन की शातिराना चालों को पढ़ने में नाकाम रहे। चीन के साथ विवादों को सुलझाने के लिए उन्होंने 'पंचशील' समझौते के तहत तिब्बत पर चीन के हक को मंजूरी भी दी थी। लेकिन नेहरू का चीन पर भरोसा भारत पर बहुत भारी पड़ा। 1962 में चीन ने भारत पर हमला बोल दिया। आज़ादी के बाद भारत आज तक सिर्फ एक लड़ाई हारा है। यह वही जंग थी, जिसमें भारत को नीचा देखना पड़ा। नेहरू का हिंदी चीनी भाई-भाई का नारा किसी काम न आया और चीन के साथ जंग में बड़ी संख्या में भारत ने अपने वीर सपूत खोए।

राज्यों का बंटवारा 
नेहरू ने भाषा के आधार पर मद्रास स्टेट को तोड़कर आंध्र प्रदेश और बॉम्बे स्टेट को तोड़कर महाराष्ट्र और गुजरात का निर्माण किया था। भाषायी आधार पर राज्यों का गठन एक बार शुरू हुआ तो यह सिलसिला आगे भी जारी रहा। आज हालत यह है कि देश में दर्जन भर राज्यों में अलग सूबे के निर्माण की आग भड़की हुई है।






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