Thursday, October 11, 2012

सर्व कल्याणमयी गौ माता

गाव: पवित्रा माङ्गल्या गोषु लोका: प्रतिष्ठिता:।
(अग्रिपुराण 292)
गऊएं पवित्र और मङ्गलदायिनी हैं। समस्त लोक गौ में ही प्रतिष्ठित हैं। गऊओं का गोबर औरगोमूत्र परम श्रेष्ठ है। उससे अलक्ष्मी (दरिद्रता) का नाश होता है। गऊओं के सींगों से खुजलाया हुआ जल सारे पापों का नाश करता है।गोबर, गोमूत्र, गो-दुग्ध, गोदधि, गो-घृत, और गो-रोचन इस षडङ्ग का पान श्रेष्ठ है और दु:स्वप्रादि दोषों का नाशक है।
गो-रोचन राक्षसों और विष का नाश करने वाला है। गऊ को ग्रास देने से मनुष्य स्वर्ग में जाता है। जिसके घर में गऊएं दुखी रहती हैं वह मनुष्य नरकों में जाता है।
‘यद्गृहे दु:खिता गाव: स याति नरकं नर:।’
जो मनुष्य दूसरे की गऊ को ग्रास देता है वह स्वर्ग को प्राप्त होता है तथा जो नित्य गऊओं की सेवा में लगा रहता है वह ब्रह्मलोक में जाता है। गोदान करके, गौ की महिमा का कीर्तन करकेऔर गऊओं की रक्षा करके मनुष्य अपने कुल का उद्धार कर सकते हैं।
गऊओं के श्वास से पृथ्वी पवित्र होती है और उनके स्पर्श से पापों का नाश होता है-
‘गवां श्चासात् पवित्रा भू: स्पर्शनात् किल्बिषक्षय:।’
प्राचीन काल में लोकपालों ने समस्त अशुभ का नाश करने के लिए गोबर आदि का व्यवहार किया था। गौ सेवक सारी कामनाओं को प्राप्त करके स्वर्ग में गमन करता है।
पोस्ट साभार:- पंजाब केसरी

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